एक ख़त

एक ख़त में गुम थे कई जज़्बात,

तुम्हें भेज रहा हूँ |

तुम्हारी यादों के कुछ नगीने ,

तुम्हें भेज रहा हूँ ।

सर्द हवाओं की वो अंगड़ाइयाँ

कही दफ़्न न हो जाए

वो हर्फ़-ए-जवानी,

तुम्हें भेज रहा हूँ ।

बादलों की ये उमड़ जो यहाँ है,

वहाँ भी तो होंगी

चांदनी रातों को जलानेवाली ये चिंगारी,

तुम्हें भेज रहा हूँ ।

वक़्त के हालातों से घिस गयी है ये रूह,

इस बेजान सी जान को,

तुम्हें भेज रहा हूँ ।

न शान-ओ-शौक़त का इरादा था,

न ऐसे सोहरत से कोई वास्ता है,

बड़ी खूबसूरती से संभाला है जिसे,

तेरी यादों की वो दौलत,

तुम्हें भेज रहा हूँ ।।

Published by

Gautam Kumar

A poet who writes poetry.

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