कितने दूर है, न जाने कहाँ है,
मेरी क़िस्मत के तराने,
किस गफ़लत में गुम है ।
  
न कोई आस, न उम्मीद में है,
वो दूर कहीं ख़ुद ख़ाक में गुम है ।
  
एक प्यास जो इधर लिए बैठा हूँ,
जिस तड़प में मन हिरण बन फिरता है ।
  
क्यूँ रात भी शांत न शीतल है,
चाँद पा जाने को मचल क्यूँ रहा है ।
  
जवाब भी सवाल पूछते है,
सवाल भी जवाब नहीं है,
एक धुन ढूँढने की है,
एक रात आँधियों की है ।
  
अब तो ख़्वाबों की तस्करी है,
तुम छुपकर बेच दो,
मैं छुपकर ख़रीद लूँगा,
फिर चुप कर के सो जाएँगे,
एक नयी तस्वीर बनाएँगे । 
  
  
   

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