उन तस्वीरों में कुछ रंग शायद बाक़ी-सा है

उन तस्वीरों में कुछ रंग शायद बाक़ी-सा है,
दिलों पर सिरों का बोझ भी तनिक भाड़ी-सा है,
साँस शब्दों के उलझनों से आज़ाद कहाँ है,
गलियों में कोई मिलनसार कहाँ है,
यादें है, वादें है, कुछ ज़िद्दी इरादे है,
मिट्टी में बनें मिट्टी में सने कुछ ढाँचे है,
कुछ कुचले और कुछ कुचलते हम-तुम है,
बस रगों में कोई पक्का रंग नहीं है,
कुछ है या नहीं कुछ, मगर ख़ाली-सा है,
उन तस्वीरों में कुछ रंग शायद बाक़ी-सा है ।।

Some of the color in those photos is probably left,
The burden of the ends on the heart is also a little
Where is your breath free from words?
Where is someone accommodating in the streets,
Memories, promises, some stubborn intentions,
Build in clay There are some structures in soil,
Some crushes and some crushing you-I,
There is no firm color in the veins,
Whether it is something or not, but it is empty,
Some of the color in those pictures is probably left

चल आज वहाँ हम जंग करें ।

आँखों में आँखे डाल कर,
सूरज से भी, गगन से भी,
नीर, अग्न, पवन से भी,
जहाँ मृत हमारी काया हो,
चल आज वहाँ हम जंग करें ।

मेरी मिट्टी में समलित तू,
और तेरी चीता की छाया मैं,
आ अपना अपना हिसाब करें,
तू मुझमें आ मैं तुझमें आऊँ,
समय, समय से जहाँ लड़ता,
चल आज वहाँ हम जंग करें ।

है तिरस्कृत मेरा सिर,
तेरा सम्मान भी झूठा है,
चल दोनो नग्न, नतमस्तक हो,
इस धरा को साफ़ करें,
तू अपना लहू दे मुझे पिला,
मेरा हर क़तरा तू पी ले,
जहाँ कभी भी गहरी रात न हो,
चल आज वहाँ हम जंग करें ।।


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बड़ा अडिग है

बड़ा अडिग है, भिमकाय
सीने पर साँप सा भारी,
खोने की खाँचों में बैठा,
एक ख़ाक  बड़ा अभिमानी,
वो सत में एक झूठ सा बैठा,
झुठों में सतज्ञानि ।

आँखों से ओझल रहता है,
पर दिमाग़ पर भाड़ी,
सभी शब्दों में छिपा है जैसे,
तेल पर तैरता पानी ।

जो कंकर को मोती कर दे,
करुणा, प्रेम की छाया,
जो हम-तुम को दूषित कर दे,
द्वेष, अभिमान की छाया ।

न उसको आज़ाद करो,
न उसकी ओढ़ लो साँया,
समय-समय है चलती,
समय-समय की माया ।

क़िस्मत के तराने

कितने दूर है, न जाने कहाँ है,
मेरी क़िस्मत के तराने,
किस गफ़लत में गुम है ।
  
न कोई आस, न उम्मीद में है,
वो दूर कहीं ख़ुद ख़ाक में गुम है ।
  
एक प्यास जो इधर लिए बैठा हूँ,
जिस तड़प में मन हिरण बन फिरता है ।
  
क्यूँ रात भी शांत न शीतल है,
चाँद पा जाने को मचल क्यूँ रहा है ।
  
जवाब भी सवाल पूछते है,
सवाल भी जवाब नहीं है,
एक धुन ढूँढने की है,
एक रात आँधियों की है ।
  
अब तो ख़्वाबों की तस्करी है,
तुम छुपकर बेच दो,
मैं छुपकर ख़रीद लूँगा,
फिर चुप कर के सो जाएँगे,
एक नयी तस्वीर बनाएँगे । 
  
  
   

मृगतृष्णा

आग है, इक आग है,
जो दर्द की हुँकार है,
जलते जहाँ ग़म थे कभी,
अब जल रहें इंसान है ।।

न सोंचता कहाँ बढ़ रहा,
क्या कर इंसान है,
बस लालसा की आग में ही,
बन रहा हैवान है ।।

ख्वाबों की झूठी साज़िशों में
बढ़ रही जो तृष्णा है,
ये मेरे मन की तृष्णा है,
ये तेरे मन की तृष्णा है,
ये कैसे मृग की तृष्णा है ।।

अब कहाँ विकट अँधेरे में

अब कहाँ विकट अँधेरे में,
उजाले ढूंढ़ा करते हो ।
फिर आश बढ़ा उन लासों में,
इन्सानियत ढूंढ़ा करते हो ।
बुनियाद बानी थी फूसों की,
महलों को ताका करते हो ।
फिर आज घने अँधेरे में ,
राहों को देखा करते हो ।

कल आधि रात,अंधेरे में ,
हम घर से निकला करते थे ।
आज उन्ही नाज़ अंधियारे में,
कुछ चीखें दबते रहते है ।
हर अमन का फूल खिला करता था,
गुलशन के गलियारों में ।
लगा के झोंका उड़ रहा,
हर साँस उधर मस्ताने में ।

फिर आँखों के नम सायें में कुछ
राह भी ताका करते है-
कभी आएगा वो,लाएगा वो
फिर से हमे हँसायेगा वो
चंद लम्हों में जो छिन गया ,
समझ,फिर कभी न आएगा वो ।।

महसूस होती है ।।

वो जो इश्क़ में महसूस होती थी,
है कहीं जो जल रही है,
महसूस होती है ।।

अपनी अदालत में खड़ी होकर,
अपनी सजा की गुहार लगाती,
एक तड़प की तपिश भी,
महसूस होती है ।।

मैं के पत्थर तो नहीं शायद,
फूल का महज़ काँटा ही सही,
अपनी ही दिल में अपनी चुभन,
महसूस होती है ।।

रंगों बदन में मंझ रहा हूँ,
फिर भी दर्द से आहत हूँ,
वो एक टूटने का ग़म भी,
महसूस होती है ।।

फिर हम चलेंगे अंगारों पर कैसे,
इन रातों के अंधियारे में,
वो हर तरफ़ की आबोहवा,
जला रही है रात दिन,
महसूस होती है ।।

रिस रहा हूँ हर पहर,
अपने पाने की चाह में,
भिंग के जो तर हो जाऊँगा,
फिर बह चलूँगा राह में,
ये सोचता तो हूँ मगर,
हर सुबह भी रात सी,
महसूस होती है, क्या करूँ ?

©nawaab

वो अर्श से लेकर फ़र्श तक, बिखरने वाली मोहब्बत

आजा फिर करें एक बार,
वो एक ड़ोर में बंधे,
पास वाली मोहब्बत ।

बादलों से बरसने की,
ग़ुज़ारिश वाली मोहब्बत ।

चिड़ियों से चहकने की,
ख्वाहिश वाली मोहब्बत ।

वो शाम से ढलने की,
ख़्वाहिसे वाली मोहब्बत ।

वो चाँद से चांदनी की,
पूछने वाली मोहब्बत ।

वो अर्श से लेकर फ़र्श तक,
बिखरने वाली मोहब्बत ।।

सोच

एक सोच क़हर है ढाने को,
एक सोच है जीवन पाने को,
लड़ना हर बात पर सोच है,
एक सोच है प्यार फैलाने को ।

पत्थर की मूरत सोच है,
मूरत, एक पत्थर, सोच ।
है सोच के अब तू हार गया,
एक सोच है हारा पाने को ।।

दिन का होना एक सोच है,
है सोच से रात में दिन ।
है सोच तो अग्नि भी पानी है,
पानी है सोच से आग ।।

तू अपनी सोच से आगे है,
दुनियाँ की आगे सोच,
तू सोच सोच न कर सका,
कोई करता है, एक पल सोच ।।

न तेरा कुछ, न मेरा कुछ,
सब सोच का,अब तू सोच,
है सोच अगर तू सोच सकें,
क्या तेरा ये भी सोच ?

यादें तेरी लाया हूँ

राहों के सुखे फूल सही,
मैं तेरे लिए ही लाया हूँ ।

कुछ भूली बिसरी याद वही,
मैं सब चुन चुन कर लाया हूँ ।

बीतें हर साल जो मिनटों -से,
उनकी हर रात को लाया हूँ ।

सावन के झूलों की रस्सियां,
डब्बे में भर कर लाया हूँ ।

नन्हे पावों की तेरी चप्पलें,
मैं बढ़ते क्रम में लाया हूँ ।

तेरे भूले वो दोस्त तेरे,
मैं ढूंढ उन्हें भी लाया हूँ ।

वो मासी-मामा,नानी-नाना
वो दूर के रिश्तेदारों को,
वो गोद मे जिसकी खूब थे खेले,
मैं सबकी यादें लाया हूँ ।

पेंसिल, रबर व कटर सहित,
तेरा वो बैग भी लाया हूँ ।

वो जिस पर तूने खूब था घुमा,
गली गली और चौक मुहल्ले,
वो दो चक्कों की तेरी जान,
साईकल भी तेरी लाया हूँ ।

तेरी स्कूल की वो डायरी,
जो घरवालों से छिपाता था,
अब धूल लगी है उसमें भारी,
मैं ढूंढ उसे भी लाया हूँ ।

कुछ और भी लाने को चाहा,
पर मिला नही मैं क्या करता,
तेरे सब वस्तु मिल ही गए,
पर बचपन तेरा मिला नहीं ।।

©indianbard