Main – ओस की एक बूँद


धर्म और तहज़ीब की अदालत है और फिर एक फिसलती जान है। ख़्वाब बंद आँखों में हिचकोले खाते है, और आँख खुलते ही ओझल हो जाते है। मैं ओस की बूँद ही तो हूँ, सुबह घासों की एक परत से चिपका रहता हूँ आँखें खुलती नहीं कि बंद हो जाती है। चारों तरफ़ दीवारें है,… Continue reading Main – ओस की एक बूँद

हर सुबह धूप नहीं होती मगर सूरज निकलता है


कभी ख़ुशी से आँखें खोले और इस दुनिया को एक बार फिर नयी तरह से देखें। संभव है? क्यूँ नहीं। मगर, फिर आशाओं की बरसात भी तो होनी है। हम भीगेंगे उस में; नहाएँगे; और फिर कल का सोच-सोचकर आज दुखी हो जाएँगे। मुमकिन है हम ज़्यादा सोचे और भूल जाएँ की कल फिर सुबह… Continue reading हर सुबह धूप नहीं होती मगर सूरज निकलता है