बड़ा अडिग है

बड़ा अडिग है, भिमकाय
सीने पर साँप सा भारी,
खोने की खाँचों में बैठा,
एक ख़ाक  बड़ा अभिमानी,
वो सत में एक झूठ सा बैठा,
झुठों में सतज्ञानि ।

आँखों से ओझल रहता है,
पर दिमाग़ पर भाड़ी,
सभी शब्दों में छिपा है जैसे,
तेल पर तैरता पानी ।

जो कंकर को मोती कर दे,
करुणा, प्रेम की छाया,
जो हम-तुम को दूषित कर दे,
द्वेष, अभिमान की छाया ।

न उसको आज़ाद करो,
न उसकी ओढ़ लो साँया,
समय-समय है चलती,
समय-समय की माया ।