अब कहाँ विकट अँधेरे में

अब कहाँ विकट अँधेरे में, उजाले ढूंढ़ा करते हो । फिर आश बढ़ा उन लासों में, इन्सानियत ढूंढ़ा करते हो । बुनियाद बानी थी फूसों की, महलों को ताका करते हो । फिर आज घने अँधेरे में , राहों को देखा करते हो ।