अब कहाँ विकट अँधेरे में

अब कहाँ विकट अँधेरे में,
उजाले ढूंढ़ा करते हो ।
फिर आश बढ़ा उन लासों में,
इन्सानियत ढूंढ़ा करते हो ।
बुनियाद बानी थी फूसों की,
महलों को ताका करते हो ।
फिर आज घने अँधेरे में ,
राहों को देखा करते हो ।

कल आधि रात,अंधेरे में ,
हम घर से निकला करते थे ।
आज उन्ही नाज़ अंधियारे में,
कुछ चीखें दबते रहते है ।
हर अमन का फूल खिला करता था,
गुलशन के गलियारों में ।
लगा के झोंका उड़ रहा,
हर साँस उधर मस्ताने में ।

फिर आँखों के नम सायें में कुछ
राह भी ताका करते है-
कभी आएगा वो,लाएगा वो
फिर से हमे हँसायेगा वो
चंद लम्हों में जो छिन गया ,
समझ,फिर कभी न आएगा वो ।।