महसूस होती है ।।

वो जो इश्क़ में महसूस होती थी,
है कहीं जो जल रही है,
महसूस होती है ।।

अपनी अदालत में खड़ी होकर,
अपनी सजा की गुहार लगाती,
एक तड़प की तपिश भी,
महसूस होती है ।।

मैं के पत्थर तो नहीं शायद,
फूल का महज़ काँटा ही सही,
अपनी ही दिल में अपनी चुभन,
महसूस होती है ।।

रंगों बदन में मंझ रहा हूँ,
फिर भी दर्द से आहत हूँ,
वो एक टूटने का ग़म भी,
महसूस होती है ।।

फिर हम चलेंगे अंगारों पर कैसे,
इन रातों के अंधियारे में,
वो हर तरफ़ की आबोहवा,
जला रही है रात दिन,
महसूस होती है ।।

रिस रहा हूँ हर पहर,
अपने पाने की चाह में,
भिंग के जो तर हो जाऊँगा,
फिर बह चलूँगा राह में,
ये सोचता तो हूँ मगर,
हर सुबह भी रात सी,
महसूस होती है, क्या करूँ ?

©nawaab